विनिर्माण प्रक्रिया

 

खनिज लोहा को इस्‍पात उत्‍पादों में परिवर्तित करने के लिए कुछ प्रौद्योगिक विकल्‍प को योजनाबद्ध रूप में नीचे दिया गया है. गरम धातु और कच्‍चा इस्‍पात प्रक्रिया आपस में जुड़ा हुआ है. जैसा कि एरो के द्वारा दिखाया गया है.

 

इस्‍पात का महत्‍व

 

हमारे जीवन में इस्‍पात का काफी प्रभाव है. कार जिसे हम चलाते हैं भवन जिसमें हम कार्य करते हैं, जिस घर में हम रहते हैं और असंख्‍य अन्‍य पहलू इसमें आते हैं. विद्युत पावर लाइन टावरों, प्राकृतिक गैस पाइप लाइनों, मशीन उपकरणो आदि में इस्‍पात का प्रयोग होता है जिसकी सूची काफी लम्‍बा है. घरों में हमारे परिवारों को सुरक्षित रखने, हमारे जीवन को सुविधाजनक बनाने में इस्‍पात का महत्‍वपूर्ण स्‍थान है. इसका फायदा निसंदेह स्‍पष्‍ट है. कच्‍चामाल के विषय में इस्‍पात अत्‍यधिक महत्‍वपूर्ण, बहुकार्यात्‍मक और सर्वाधिक अनुकूलनीय है. यदि इस्‍पात नहीं होता तो मानव जाति का विकास संभव नहीं होता. इस्‍पात के बल पर और सहज प्रयोग से विकसित अर्थव्‍यवस्‍था का आधार रखा गया था. इस्‍पात का विविध प्रयोग क्रमशः इस्‍पात का अनुकूलनीय मापदण्‍ड है जो इस्‍पात के निम्‍नलिखित विशेषताओं से ऑंका जा सकता है --

गर्म और ठण्‍डा आकार का, वेल्‍ड करने योग्‍य, उपयुक्‍त क्षमता वाला मशीन, सख्‍तकठिन- टिकाऊ प्रतिरोधी, जंग प्रतिरोधी, ताप प्रतिरोधी और उच्‍च तापमान पर आये विकृति से सामना. इस्‍पात का अन्‍य सामनों से तुलना किया जाय तो इसका उत्‍पादन लागत कम है. एलुमिनियम को बनाने में जितना उर्जा लगता है उसका लगभग 25% उर्जा से लोह अयस्‍क से लोहा बनता है. इस्‍पात परिसर में मित्र् के समान है जिसको पुनः कार्य में लाया जा सकता है. भूपटल में 5.6% लोहे के तत्‍व हैं जो कच्‍चा माल का आधार है. एक साथ रखे हुए सभी नन फेरस धातुओं के उत्‍पादन से अगर तुलना की जाए तो इस्‍पात का उत्‍पादन 20 गुना अधिक है. इस्‍पात उद्योग नये प्रौद्योगिकी का विकास किया है और विश्‍व को मजबूत बनाने के लिए एवं पहले से अच्‍छा अत्‍याधिक घुमउ माल बनाने के लिए प्रतिस्‍पर्धा किया है. सब मिलाकर इस्‍पात का लगभग 2000 ग्रेड का विकास हुआ है जिसमें 1500 ग्रेड का इस्‍पात उच्‍च ग्रेड का है. तथापि विभिन्‍न प्रकार के साज- सामान के साथ इस्‍पात के नये ग्रेडों के विकास हेतु असीम संभावना है. पर्याप्‍त संख्‍या में ग्रेड इस्‍पात को आधारीय उत्‍पादन माल की विशेषता प्रदान करता है. हमारे जीवन में इस्‍पात के उपयोग का महत्‍वपूर्ण स्‍थान है और आने वाले वर्षों में इसका उपयोग होता रहेगा. तथापि इस्‍पात का प्रमुख स्‍थान बनाए रखने के लिए जिस मात्रा की आवश्‍यकता है वह नये उच्‍च ग्रेड और अनुकूलनीय ग्रेडों का विकास कर इस्‍पात का संभावित उपयोग कर सकने पर निर्भर करता है. ये संरचना को परिष्‍कृत कर और तकनीक में मिश्रण कर प्राप्‍त किया जा सकता है और इस प्रकार इसके उपयोगिता के महत्‍व को बढाया जा रहा है. इस्‍पात के प्रयोग हेतु हमलोगों को तरीके का पता लगाना होगा और भविष्‍य में एलुमिनियम से कठिन प्रतिस्‍पर्धा का सामना करने के लिए तैयार रहना है.

 

इतिहास में लोहा और इस्‍पात को माना जाता है कि प्रागैतिहासिक युग में लोहा उल्‍कापिण्‍ड के टुकड़े से प्राप्‍त हुआ है और कई सदियों से यह दुर्लभ धातु बना हुआ है. बाद में इनसान लोह अयस्‍क से लोहा कैसे प्राप्‍त करना है सीखा. उत्‍पाद संभवतः अपेक्षाकृत इतना चिकना और अनुमान न करने योग्‍य था कि हथियार हेतु कॉंस्‍य को तरजीह दिया गया. अंततः जब मानव लोहे को गलाने,फोजिंग करने, कठोर एवं टेमपरिंग करने के कठिन कला का मास्‍टर हो गया तो इन उद्देश्‍य हेतु लोहे ने नन फेरस धातु का स्‍थान ले लिया. प्राचीन काल में मानव द्वारा प्रयोग किये गये लोहा का प्रमाण बेबिलोन, मिश्र, चाइना, भारत, यूनान और रोम जैसे प्राचीन सभ्‍यतायें से प्राप्‍त अपूर्ण लेख और इभिलेख में धातु के संदर्भ में प्राप्‍त अपूर्ण लेख और अभिलेख में धातु के संदर्भ में प्रमाण मिला है. मेसीपोटामिया और मिश्र में पाये गये पुरावशेष से यह प्रमाण मिलता है कि लोहा और बाद का इस्‍पात का लगभग 6000 वर्षो तक मानव जाति इसका प्रयोग करता था. प्राचीन काल में लकड़ी से बने हुए काठ कोयला को प्रयोग कर लौहे को गलाया जाता था. बाद में कोयला का ताप का वृहत श्रोत के रूप में पता लगाया गया. तदनन्‍तर यह कोक में परिवर्तित हो गया जो लोह अयस्‍क को गलाने हेतु आदर्श पाया गया. . अमेरिका में 1646 ईसवी में सफलतापूर्वक स्‍थापित आयरन वर्क्‍स दी साउगस वर्क्‍स के पश्‍चात लगभग 200 या इससे अधिक वर्षो के लिए लोहा अपना प्रबल स्‍थान बनाये रखा. नये रेल ट्रेनों के आविष्‍कृत होने से लोहा से पटरी बना. लड़ाकू जहाजों के साइड को लोहे के कवच से सुरक्षित रखने के लिए लोहे का प्रयोग होता था. लगभग 19 वीं शताब्‍दी के मध्‍य में 1856 में बेसेमर प्रक्रिया के आविष्‍कार से इस्‍पात के युग का आरंभ हुआ जो इस्‍पात को पर्याप्‍त मात्रा एवं उचित लागत में बनाने की अनुमति दे दी. प्राचीन भारत में लोहा इस्‍पात का पूरा उल्‍लेख है. कुछ प्राचीन स्‍मारक जैसे नई दिल्‍ली में प्रसिद्ध लोह स्‍तम्‍भ या कोणार्क में सन टेम्‍पल में प्रयोग किया गया ठोस बीम में पर्याप्‍त साक्ष्‍य मिलता है जो प्राचीन भारतीय धातु विज्ञानी का प्रौद्योगिकीय उत्‍कर्ष दिखाता है. भारत में लोहे का प्रयोग प्रचीन युग की ओर ले जाता है. वेदिक साहित्यिक स्रोत जैसा कि ऋगवेद, अथर्ववेद, पुराण, महाकाब्‍य में शान्ति और युद्ध में लोहे के गारे में उल्‍लेख किया गया है. एक अध्‍ययन के अनुसार लोहा भारत में आदिकालीन लघु सुविधाओं में 3000 वर्षों से अधिक समय से भारत में उत्‍पन्‍न होता है.

 

इतिहास में लोहा और इस्‍पात

 

यह माना जाता है कि प्रागैतिहासिक युग में लोहा उल्‍कापिण्‍ड के टुकड़े से प्राप्‍त हुआ है और कई सदियों से यह दुर्लभ धातु बना हुआ है. बाद में इनसान लोह अयस्‍क से लोहा कैसे प्राप्‍त करना है सीखा. उत्‍पाद संभवतः अपेक्षाकृत इतना चिकना और अनुमान न करने योग्‍य था कि हथियार हेतु कॉंस्‍य को तरजीह दिया गया. अंततः जब मानव लोहे को गलाने,फोजिंग करने, कठोर एवं टेमपरिंग करने के कठिन कला का मास्‍टर हो गया तो इन उद्देश्‍य हेतु लोहे ने नन फेरस धातु का स्‍थान ले लिया. इतिहास में लोहा और इस्‍पात को माना जाता है कि प्रागैतिहासिक युग में लोहा उल्‍कापिण्‍ड के टुकड़े से प्राप्‍त हुआ है और कई सदियों से यह दुर्लभ धातु बना हुआ है. बाद में इनसान लोह अयस्‍क से लोहा कैसे प्राप्‍त करना है सीखा. उत्‍पाद संभवतः अपेक्षाकृत इतना चिकना और अनुमान न करने योग्‍य था कि हथियार हेतु कॉंस्‍य को तरजीह दिया गया. अंततः जब मानव लोहे को गलाने,फोजिंग करने, कठोर एवं टेमपरिंग करने के कठिन कला का मास्‍टर हो गया तो इन उद्देश्‍य हेतु लोहे ने नन फेरस धातु का स्‍थान ले लिया.

प्राचीन काल में मानव द्वारा प्रयोग किये गये लोहा का प्रमाण बेबिलोन, मिश्र, चाइना, भारत, यूनान और रोम जैसे प्राचीन सभ्‍यतायें से प्राप्‍त अपूर्ण लेख और इभिलेख में धातु के संदर्भ में प्राप्‍त अपूर्ण लेख और अभिलेख में धातु के संदर्भ में प्रमाण मिला है. मेसीपोटामिया और मिश्र में पाये गये पुरावशेष से यह प्रमाण मिलता है कि लोहा और बाद का इस्‍पात का लगभग 6000 वर्षो तक मानव जाति इसका प्रयोग करता था. प्राचीन काल में लकड़ी से बने हुए काठ कोयला को प्रयोग कर लौहे को गलाया जाता था. बाद में कोयला का ताप का वृहत श्रोत के रूप में पता लगाया गया. तदनन्‍तर यह कोक में परिवर्तित हो गया जो लोह अयस्‍क को गलाने हेतु आदर्श पायाप्राचीन काल में मानव द्वारा प्रयोग किये गये लोहा का प्रमाण बेबिलोन, मिश्र, चाइना, भारत, यूनान और रोम जैसे प्राचीन सभ्‍यतायें से प्राप्‍त अपूर्ण लेख और इभिलेख में धातु के संदर्भ में प्राप्‍त अपूर्ण लेख और अभिलेख में धातु के संदर्भ में प्रमाण मिला है. मेसीपोटामिया और मिश्र में पाये गये पुरावशेष से यह प्रमाण मिलता है कि लोहा और बाद का इस्‍पात का लगभग 6000 वर्षो तक मानव जाति इसका प्रयोग करता था. प्राचीन काल में लकड़ी से बने हुए काठ कोयला को प्रयोग कर लौहे को गलाया जाता था. बाद में कोयला का ताप का वृहत श्रोत के रूप में पता लगाया गया. तदनन्‍तर यह कोक में परिवर्तित हो गया जो लोह अयस्‍क को गलाने हेतु आदर्श पाया गया

. अमेरिका में 1646 ईसवी में सफलतापूर्वक स्‍थापित आयरन वर्क्‍स दी साउगस वर्क्‍स के पश्‍चात लगभग 200 या इससे अधिक वर्षो के लिए लोहा अपना प्रबल स्‍थान बनाये रखा. नये रेल ट्रेनों के आविष्‍कृत होने से लोहा से पटरी बना. लड़ाकू जहाजों के साइड को लोहे के कवच से सुरक्षित रखने के लिए लोहे का प्रयोग होता था. लगभग 19 वीं शताब्‍दी के मध्‍य में 1856 में बेसेमर प्रक्रिया के आविष्‍कार से इस्‍पात के युग का आरंभ हुआ जो इस्‍पात को पर्याप्‍त मात्रा एवं उचित लागत में बनाने की अनुमति दे दी.

 

प्राचीन भारत में लोहा का प्रयोग

 

प्राचीन भारत में लोहा इस्‍पात का पूरा उल्‍लेख है. कुछ प्राचीन स्‍मारक जैसे नई दिल्‍ली में प्रसिद्ध लोह स्‍तम्‍भ या कोणार्क में सन टेम्‍पल में प्रयोग किया गया ठोस बीम में पर्याप्‍त साक्ष्‍य मिलता है जो प्राचीन भारतीय धातु विज्ञानी का प्रौद्योगिकीय उत्‍कर्ष दिखाता है.

 

 

भारत में लोहे का प्रयोग प्रचीन युग की ओर ले जाता है. वेदिक साहित्यिक स्रोत जैसा कि ऋगवेद, अथर्ववेद, पुराण, महाकाब्‍य में शान्ति और युद्ध में लोहे के गारे में उल्‍लेख किया गया है. एक अध्‍ययन के अनुसार लोहा भारत में आदिकालीन लघु सुविधाओं में 3000 वर्षों से अधिक समय से भारत में उत्‍पन्‍न होता है.

 

भारतीय इतिहास में लौह एवं इस्‍पात के क्षेत्र में कुछ मील का पत्‍थर.

 

326 ईसा पूर्व

पोरस ने भारतीय लोहे का 30 एल बी एस अलेक्‍जेन्‍डर को प्रदान किया.

300 ईसा पूर्व

अर्थशास्‍त्र में कोटिल्‍य (चाणक्‍य) ने खनिज, जिसमें लोह अयस्‍क सम्मिलित है, की जानकारी दी और धातुओं को निकालने के कौशल का उल्‍लेख किया है.

320 ईसवी

इंदोर के निकट मालवा के प्राचीन राजधानी धार में ए-16-मीटर लौह स्‍तम्‍भ स्‍थापित किया गया था.

380 ईसवी

दिल्‍ली के निकट चंद्रगुप्‍त- की स्‍मृति में लोह स्‍तम्‍भ स्‍थापित किया गया. इस पिटवॉं लोहा का ठोस स्‍तम्‍भ लगभग 8 मीटर लम्‍बा और डाया 0.32 से 0.46 मीटर है.

13 वीं सदी

सन टेम्‍पल, कोणार्क के निर्माण में ठोस लोहा बीमों का इस्‍तेमाल हुआ है.

16वीं सदी

मध्‍य पूर्व और यूरोप में इंडियन स्‍टील जो वुट्ज आफ वाटरी अपिअरन्‍स से जाना जाता है का इस्‍तेमाल हुआ है.

17 वीं सदी

तोपों, अग्निशस्‍त्र और तलवार एवं कृषीय उपकरण का विनिर्माण. तेन्‍डुलकमा एम.पी.के साउगोर में लोहा से 1830 में बीज के दपर ससपेन्‍शन ब्रिज बनाया गया. मद्रास प्रेसिडेन्‍सी के पोरटो नोवा में जे .एम हीथ ने आयरन स्‍मेल्‍टर बनाया.

1870

कुल्‍टी में बंगाल आयरन वर्क्‍स स्‍थापित किया गया.

1907

टाटा आयरन एण्‍ड स्‍टील कम्‍पनी बनाया गया.

1953

राउरकेला में स्‍टील प्‍लांट का ढॉंचा बनाने के लिए भारत सरकार ग्रुप डेमग,फेडरल रिपब्लिक आफ जर्मनी के साथ समझौता किया .

1954

राउरकेला, दुर्गापुर और भिलाई में हिंदुस्‍तान स्‍टील लिमिटंट ने तीन एकीकृत स्‍टील प्‍लांन्‍ट का निर्माण और प्रबंध किया .

 

 

तापानुशील (अनीलिंग)

 

ताप या उष्‍मीय अभिक्रिया प्रणाली जिससे पूर्व कोल्‍ड-रोल्‍ड इस्‍पात काइल निर्दिष्‍ट तापमान पर गर्म करके बनाने और मोड़ने के लिए पर्याप्‍त समय में और उसके बाद ठंण्‍डा करके अधिक उपयुक्‍त बनाया जाता है. जब एक कॉइल इस्‍पात ब्रिटल और भंगुर को छोड़कर कोल्‍ड रोल्‍ड होता है तो धातु कज के बीच का बान्‍ड फैलता है. तापानुशीतन को पुनः धारण करने इस्‍पात के कण का बनावट उच्‍च तापमान पर नये बान्‍ड को बनाने की अनुमति देता है. तापानुशीतन का दो तरीका हैबेच ( बाक्‍स)तीन से चार कॉंइल परस्‍पर उच्‍चाई पर इक्‍कठा हो जाता है और उच्‍चई पर आवरण को रख दिया जाता है. और नरन्‍तर --- काइल खुल जाता है और हीटर के अन्‍दर ऊध्‍वधिर परिपथ के एक श्रृंखला से होकर पहुंचता है. इस्‍पात के लिए वांछित मशीनी सम्‍पत्ति को प्राप्‍त करने हेतु तापमान एवं शीतल अनुपात को नियंत्रत किया जाता है.

 

एलाय इस्‍पात

 

माल जिसमें लौह कार्बन ( 2 से कम) सिलिकन, मैंगनीज और एलाय तत्‍वों जैसे क्रोमियम, वेनाडियम, मोलिबडेनियम, तंगस्‍टेन, निकल लेड, नाबोइम, कापर इत्‍याहद,

 

बी बेसिक आक्सिजन फरनेस ( बी.ओ.एफ)

एक नाशपाती के आकार का फरनेस जिसमें कार्बन, ािलिकन इत्‍यादि (अवयव) को कम करने हेतु आक्‍सीजन को दे कर गर्म धातु को परिष्‍कृत किया जाता है जिसके द्वारा द्रव रूप में इस्‍पात हो जाता है. गंदगी गैस और धातु मल के रूप में बाहर चला जाता है.

 

बार

लॉंग इस्‍पात उत्‍पाद बिलिट्स से घुमता है. वे गोल , सपाट, एन्‍गल, वर्गाकार और चैनल के तरह हैं जो फर्नीचर, सीढ़ी रेलिंग और खेती का उपकरण जैसे सामान्‍य प्रकार के उत्‍पादों को बनाने के लिए निर्माता द्वारा इस्‍तेमाल किया जाता है.

 

बी0एफ0कोक

25 मी0मी0 से 80 मी0मी0 के रेंज में जॉंच करके साइज्‍ड कोक को प्राप्‍त किया जाता है जो ब्‍लास्‍ट फरनेस में चार्ज करने हेतु उपयुक्‍त है.

 

बिलिट

एक अर्ध पिफनिस्‍ड इस्‍पात फार्म जो इनपुट माल है जिससे लॉग उत्‍पाद, बार ,चैनल या अन्‍य यंरचनात्‍मक सेपों का विनिर्माण होता है. सामान्‍यतः बिलिट दो से सात इंच वर्ग के आकार का होता है.

 

ब्‍लैक प्‍लेट

कोल्‍ड रिड्यूस शीट इस्‍पात जो 12-32 इंच चौड़ा होता है टिन मिल में तह चढ़ाने के लिए कच्‍चा माल के रूप में कार्य करता है.

 

 

ब्‍लास्‍ट फरनेस

ब्‍लास्‍ट फरनेस काउन्‍टर करेंट ऊध्‍वधिर शाफ्ट फरनेस ( उच्‍च ताप सह लान्‍ड) है जो आयस्‍क में उपस्थित लौह आक्‍साइड को कम करता है और इंधन और लघु कारक के रूप में कोक का प्रयोग कर द्रव लोहा में सिन्‍टर करता है जो गर्म धातु कहलाता है. टाप से कच्‍चा माल को चार्ज किया जाता है. मिश्रण को निकालने के लिए फ्लक्‍सेज ( चूना पत्‍थर और डोलोमाइट) को मिलाया जाता है जो स्‍लेग के रूप में बाहर आता है. पूर्व से गर्म हवा को वाटर कुल्‍ड कापर ट्वियेअर के द्वारा फरनेस में अभिक्रिया की सुविधा प्रदान करने के लिए नीचे से छोड़ा जाता है और बर्डेन को टाप डिसेन्‍ड से चार्ज किया जाता है. जिसके परिणामस्‍वरूप काउन्‍टर करेंट का पारस्‍परिक क्रिया होता है. समय-समय पर गर्म धातु ओर स्‍लेग नीचे से टेण्‍ड किया जाता है और स्‍टील प्‍लांट में गैस जो टाप से उठता है उसे साफ किया जाता है और इंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है.

 

ब्‍लूम

एक अर्ध-पिफनिस्‍ड इस्‍पात फार्म जिसका आयताकार क्रास-सेक्‍शन 8 इंच से अधिक है. यह इस्‍पात शेष इनपुट सामग्री है जो आइ-बीम, एच-बीन और सीट पिलिंग को बनाने के लिए हिै अत्‍याधिक छोटा क्रास-सेक्‍शन तक ब्‍लूम के रिडक्‍शन का परिणाम बिलिट का निर्माण है.

 

कोक भट्टी ( अवन)सिनटर- बी.एफ-बाफ रूट

बी.एफबाफ रूट अधिकांशतः सामान्‍य इस्‍पात बनाने का प्रौद्योगिकी है रिडक्‍टेन्‍ट और उष्‍मीय उर्जा के स्रोत के रूप में कोक का इस्‍तेमाल होता है. ब्‍लास्‍ट फरनेस में अयस्‍क से द्रव धातु के रूप में परिवर्तित हो जाता है जाता है और इस्‍पात बनाने के लिए कनवटर में परिष्‍कृत होता रहता है. इस्‍पात संयन्‍त्र के विविध चरणों का नीचे वर्णन किया गया है ---

 

कोक मेकिंगकोयला कार्बनीकरण

 

कोकिंग कोयला वह कोयला है जो वायु के अभाव में गर्म होता है. पहले गलता है, प्‍लास्टिक अवस्‍था में पहुंच कर फैलता है और ठोस कोहिरन्‍ट मैस उत्‍पन्‍न करने के लिए पुनः ठोस बन जाता है जो कोक कहलाता है. वायु के अभाव में कोकिंग कोयला है और समय को गर्म किया जाता है तो गैस और वाष्‍प के विकास के साथ भौतिक और रसायनिक परिवर्तनों का एक श्रृंखला घटित होता है और ठोस अवशेष रह जाता है जो कोक कहलाता है.

 

तापन वाल के मध्‍य अवन ( भट्टी) सेंडविच्‍ड के कोक अवन बेटरी में परम्‍परागत कोक मेकिन्‍ग होता है. वांछित यान्त्रक और उष्‍मारासायनिक साज-समान के मेटालर्जिकल कोक को बनाने हेतु ये डिभोलेटाइजेशन के निश्चित डिग्री तक लगभग 1000-1100 सेंटीग्रेड तापमान पर कार्बनीकृत होता है.

 

कार्बनीकरण के दौरान कोकिंग कोयला लगभग 350-400 सेंटिग्रेड वृद्ध होने पर प्‍लास्टिक अवस्‍था में परिवर्तित हो जाता है और अर्ध-कोक एवं इसके बाद कोक बनाने के लिए लगभग 500-550 सेंटिग्रेड पर पुनः ठोस हो जाता है. कोक अवन में अवन के अंदर कोयला के चार्ज होने के पश्‍चात तापन वाल के निकट प्‍लास्टिक तह बनता है और समय के अनुसार दोनों साइड से प्‍लास्टिक तह अवन के केन्‍द्र की ओर बढ़ता है और अंत में केन्‍द्र पर एक दूसरे से मिलते हैं. कोक मेकिंग के दौरान दो विपरीत अभिक्रिया होता है अर्थात संघनन और ताप-अपघटन प्‍लास्टिक तह का गुणवता और मात्रा अत्‍याधिक महत्‍व का है और कोक मेट्रिक्‍स के अन्‍तनिाहित शक्ति को निर्धारित करता है. अच्‍छे किस्‍म का कोक को बनाने के लिए कोयले को निश्चित डिग्री तक परिपक्‍व (रेंक 1.1-1.3), अच्‍छा रियोलोजिकल साज-समान (लगभग 200-1000 डी.डी.पी.एम गिसेलर प्‍लास्‍टो मीटर के द्वारा) तरलता का व्‍यापक होना और निम्‍न इनट होना चाहिए.

 

कोक मेकिंग के लिए अनेक आशोधन कोक को उत्‍पन्‍न करने एवं एस.सी. को कम करने में सहायता करता है. उर्जा खपत निम्‍न हैं

 

कोयला चार्ज ( पी.बी.सी.सी) का आंशिक ब्रिकेटिंग

 

ब्रिकेट्स के रूप में लगभग 30 कोयला सम्मिश्रण को चार्ज करने में प्रौद्योगिक शामिल है. चार्ज के 2 से 3.0% तक ब्रिकेट्स बाइन्‍डर ( विच+ टार) का इस्‍तेमाल कर तैयार किया जाता है. चार्ज के बल्‍क के घनत्‍व में वृद्ध के परिणामस्‍वरूप कोक के गुणवत्‍ता में महत्‍वपूर्ण सुधार होता है.

 

कोयले का स्‍टाम्‍प चार्जिंग --- उत्‍कृष्‍ट क्रैश कोयले ( 88-90% 3 एम.एम) के साथ स्‍टेबल कोयला केक को बनाने में अवन के बाहर यांत्रिक स्‍टेम्पिंग और पुशिंग के द्वार कार्बनीकरण के लिए अवन के अंदर केक निर्मित होता है. जिसमें प्रौद्योगिकी मूलतः शामिल है. केक को बनाने के लिए कोयला के अद्रता को 8-10 पर बनाए रखा जाता है. स्‍टेम्पिंग के कारण चार्ज का बल्‍क घनत्‍व 30-35 तक बढ़ जाता है जिसके परिणामस्‍परूप मिकम इनडिसेज और कोक के सी.एस.आर मूल्‍यों में महत्‍वपूर्ण सुधार हुआ है. 10-12 तक अवन का उत्‍पादकता बढ़ा है और लगभग 20 तक निकृष्‍ट कोकिंग कोयला का इस्‍तेमाल की संभावना है.

 

कोयला का सिलेक्टिव क्रैशिंग --

 

इस प्रौद्योगिकी में कोर्स और फाइन साइज प्रोक्‍शन के भिन्‍न साज-समान की कम करके कोयला में प्रतिक्रियाशील एकरूपता एवं इनर्ट अवयव को सुधारने का लक्ष्‍य है. पेट्रोग्रापिफकली हेटरजीनयन्‍स ( पंचमेल) कोयला जैसा कि इंडियन कोयला के लिए यह प्रौद्योगिकी बहुत उपयोगी है.

 

ड्राइ कोक क्‍वेन्चिग---

पोस्‍ट- कार्बनीकरण अभिक्रिया के लिए कोक का ड्राई क्‍वेन्चिंग मुख्‍य प्रौद्योगिकी है जिसका काफी चर्चा छिड़ा है. परम्‍परागत वाटर क्‍वेन्चिंग के बदले इनर्ट गैसों द्वारा रेड-हाट कोक को इसमें कूल किया जाता है. यह न केवल रेड-हाट ( कोक के सेंसिबल हीट का 80 भाग की पूर्ति किया जा सकता है और स्‍टीम के उत्‍पादन हेतु इस्‍तेमाल किया जा सकता है) के उष्‍मीय शक्ति का प्रभावकारी रूप से इस्‍तेमाल किया जाता है बल्कि कोक के गुणवत्‍ता ( 1 प्‍वाइट के द्वारा एम 10 इन्‍डेक्‍स में सुधार किया जा सकता है) में भी सुधार करता है.

 

सिनटरिंग ----

 

सिनटरिंग प्रौद्योगिकी लोह अयस्‍क के अग्‍लामरेशन के लिए है जो उपयोगी ब्‍लास्‍ट फरनेस बर्डेन मेटेरियल में साफ होता है. 20 वीं शताब्‍दी के प्रारंभिक समय में वेस्‍ट को साफ करने के लिए प्रौद्योगिकी का विकास हुआ था. तब से सिनटर व्‍यापक रूप से स्‍वीकार्य और पसंदिदा ब्‍लास्‍ट फरनेस बर्डेन मेटेरियल हो गया. वर्तमान में सिनटर के द्वारा विश्‍व में हाट मेटल का 70 भाग उत्‍पन्‍न किया जाता है. भारत में हाट मेटल का लगभग 50 भाग ब्‍लास्‍ट फरनेस में सिनटर फीड का इस्‍तेमाल कर उत्‍पन्‍न किया जाता है.

 

बी.एफ.एस में सिनटर के इस्‍तेमाल का मुख्‍य लाभ निम्‍न है----

 

         हाट मेटल उत्‍पादन के लिए लोह अयस्‍क फाइन्‍स, कोक ब्रीज, मेटालर्जिकल वेस्‍ट, चूना एवं डोलोमाइट का इस्‍तेमाल.

         उत्‍कृष्‍ट रिड्यूसिबिलिटी और अन्‍य उच्‍च तापमान साज-सामान.

         बी.एफ उत्‍पादकता में वृदि

         हाट मेटल के गुणवत्‍ता में सुधार

         ब्‍लाष्‍ट फरनेस में कोक दर में कमी

 

कच्‍चा माल जिसका इस्‍तेमाल होता है निम्‍न है ---

 

उत्‍कृष्‍ट लोह अयस्‍क ( -10एम.एम) ,कोक ब्रीज (-3 एम.एम), चूना पत्‍थर और उत्‍कुष्‍ट डोलोमाइट (-3एम.एम) एवं अन्‍य मेटालर्जिकल वेस्‍ट. मिक्सिंग ड्रम में समानुपात कच्‍चा माल मिश्रित और गीला होता है. फीडर के द्वारा सिनटर मशीन में मिश्रण को लोड किया जाता है मुविंग ग्रेट ( पैलिट) पर और तब सेग्रिगेशन प्‍लेट के द्वारा मिश्रण को रोल्‍ड किया जाता है जिससे कि अपरिष्‍कृत माल नीचे हो जाय और टाप पर साफ हो जाय.

 

1200डिग्री सेंटिग्रेड पर मिश्रण के टाप सतह को स्‍टेशनरी बर्नर के द्वारा सुलगाया जाता है जैसे ही पैलिट आगे बढ़ता है ग्रेट में स्थित विन्‍ड बाक्‍स के द्वारा हवा निकलता है. मिश्रण और उद्दीप्‍त सिनटर के हीट का पुनरूत्‍पादन एवं बाहर निकलने वाली गैसों के ठोस इंधन के दहन के कारण चार्ज बेड में उच्‍च तापमान दहन जोन उत्‍पन्‍न होता है. पालिट के आगे की और संचलन के कारण सिनटरिंग प्रक्रिया ऊर्ध्‍वाधर नीचे की ओर बढ़ता है. सिनटर बेड पर उत्‍पन्‍न होने वाले विभिन्‍न जोनों को अड़जाइनिंग फिगर में दिखाया गया है. स्‍थानीय परिसीमित गलन, ग्रेन बाउण्‍ड्री विस्‍तार ( डिफ्यूश्‍जन) और लौह आक्‍साइड के पुनः क्रिस्‍टलाइजेशन के संयुक्‍त परिणाम के रूप में सिनटर को तैयार किया जाता है.

 

सिनटरिंग प्रक्रिया के समापन पर फिनिस्‍ड सिनटर केक को क्रेशड और कूल किया जाता है. कूल सिनटर को स्‍क्रीनड किया जाता है और ब्‍लास्‍ट फरनेंस के लिए + 6 एम.एम फ्रेक्‍शन को डिस्‍पैच कर और रिटर्न सिनटर के रूप में - 6 एम.एम. रिसरकुलेटेड होता है.

 

ब्‍लास्‍ट फरनेस---

 

ब्‍लास्‍ट फरनेस लोह मेकिंग विधि मूलतः लोहा आक्‍साइड से द्रव लोहा में बदलने से होता है. उपर्युक्‍त कमी की अभिक्रिया करने और प्रगलन के उत्‍पादो को गलाने हेतु लोहा आक्‍साइड और हीट को कम करने के लिए रिडक्‍टेन्‍ट अपेक्षित है. इन दोनों आवश्‍यकताओं को पूरा करने के लिए प्रारंभिक श्रोत कार्बन ( कोक के रूप में) है जो गर्म धातु उत्‍पादन के लागत का मुख्‍य हिस्‍सा है.

 

ब्‍लास्‍ट फरनेस ऊर्ध्‍वाधर काउन्‍टर करेन्‍ट हीट एक्‍सचेंजर के साथ-साथ रासायनिक रिऐक्‍टर है जिसमें टाप डिसेन्‍ड डाउनवर्ड और ट्वियेअर लेबल एसेन्‍ड अपवर्ड पर गैसों के उत्‍पन्‍न होने से बर्डेन माल चार्ज होता है.

 

उपर से नीचे तक फरनेस के अंदर का प्रोफाइल थ्रोट, शाफ्ट, बेलि, बाश और हार्थ नाम से जाना जाता है. थ्रोट फरनेस का उपर का भाग है और चार्जिंग कोक एवं बर्डेन माल और उपरी गैस को ड्राइन्‍ग आफ करने के लिए आवश्‍यक व्‍यवस्‍था करना सम्मिलित है. टाप गैस जिसमें फ्लू डस्‍ट समाये हुये है का मार्ग फरनेस टाप से गैस शोधक तक और तब कनसमशन ( खपत) जोण तक होता है. शाफ्ट में फरनेस का प्रोफाइल चौड़ा होता है जो फालो करता है. उपर से नीचे तक फरनेस चेम्‍बर को चौड़ा होने के लिए हेंगिग को दूर करना जरूरी है और ब्‍लास्‍ट फरनेस में बर्डेन का स्‍कैफल्डिंग होता है जब वे हींटिग के दौरान फैलता है. शाफ्ट का ऊंचाई फरनेस के कुल ऊंचाई का लगभग 3/5 है. बेली के द्वारा शाफ्ट चलता है एवं इसके नीचे बाश में प्रोफाइल दुबारा संकीर्ण हो जाता है. जैसा कि यह फरनेस का भाग है जहॉं स्‍टाक कालम का गलना शुरू होता है और फरनेस का वाल्यूम कम हो सकता है. हाथ फरनेस का निचला सिलिनड्रिकल भाग है जिसमें फ्लूड स्‍लेग और गर्म धातु संचित होता है. कापर का बना हुआ वाटर कूल्‍ड टिवयेअर हाथ के उपरी भाग में व्‍यवस्थित रहता है. दहन के लिए गर्म हवा ब्‍लास्‍ट फरनेस में इसके द्वारा भर दिया जाता है.टेप होल के द्वारा गर्म धातु को टेप्‍ड किया जाता है जो कास्‍ट हाउस के रनर के नीचे रखे लेडल्‍स के ट्रेन में पावर ड्राइभेन ड्रिल्‍स के द्वारा ओपन होता है. धातु के साथ स्‍लेग आता है और स्किमर प्‍लेट के सहायता से स्‍लेग रनर के तरफ उतारा जाता है एवं स्‍लेग थिम्बल में एकत्र किया जाता है. टेपिंग प्रक्रिया के समाप्‍त होने के पश्‍चात मड गन से टेप होल को कसकर सिल किया जाता है. कनवेअर या स्किप के द्वारा ब्‍लास्‍ट फरनेस में चार्ज होने के पूर्व कच्‍चा माल जैसे अयस्‍क, सिनटर, कोक स्क्रिन्‍ड होता है. ब्‍लास्‍ट फरनेस में दहन के लिए हवा को टर्बो ब्‍लोअर से छोड़ा जाता है जो लगभग 1300 डिग्री सेंटिग्रेड के तापमान पर गर्म ब्‍लास्‍ट स्‍टोव में पहले से हीट किया जाता है और उसके बाद ब्‍लास्‍ट फरनेस में टिवयेअर के द्वारा छोड़ा या फूंका जाता है. दो या अधिक स्‍टोवों के साथ प्रत्‍येक ब्‍लास्‍ट फरनेस को सज्जित किया जाता है जो बारी बारी से आपरेट किया जाता है. फरनेस में इंधन खपत को कम करने में पहलं से गर्म हवा सहायता करता है.

 

रिएक्‍सन --

---फरनेस के उपर से नीचे तक निम्‍नलिखित प्रक्रिया घटित होता हैः-

--- शोषक, प्रि हीटिंग, हाइड्रेट पानी को बाहर निकालना

--- अप्रत्‍यक्ष कमी ( रिडक्‍शन)

--- प्रत्‍यक्ष कमी (रिडक्‍शन)

--- गलन

 

शाफ्ट के टाप थर्ड में गैस हीट देता है जिससे चार्जिंग माल प्रिहीटेड एवं शुष्कित हो जाय. जब तापमान 400 डिग्री से 500 डिग्री सेंटिग्रेड हो जाता है तब बर्डेन के साथ जमा हुआ पानी निकलता है. कार्बन मोनोआक्‍साइड के द्वारा अप्रत्‍यक्ष कमी 1000 डिग्री सेंटिग्रेड के नीचे मिलता है. 1000 डिग्री सेंटिग्रेड तापमान के उपर जो लोहा आक्‍साइड अब तक लोहा में बदला नहीं है वह प्रत्‍यक्ष रूप से लोहा में बदल जाता है. गलने के पश्‍चात जैसे ही गर्म धातु कोक के सतह से बहता है बदलने की प्रक्रिया पूरा हो जाता है.

 

ब्‍लास्‍ट फरनेस में उत्‍पन्‍न गर्म धातु बेसिक ऑक्‍सीजन फरनेस में इस्‍पात मेकिंग के लिए या लेडल में पिग लोहा कास्टिंग के लिए पिग कास्टिंग मशीनों में भेजा जाता है .

 

गर्म धातु का पूर्व अभिक्रिया ब्‍लास्‍ट फरनेस से गर्म धातु को उपयोग इस्‍पात में बदलने से पूर्व अनिच्दित तत्‍वों जैसे सल्‍फार, सिलिकन या फासफोरस की हटाने के लिए किया जाता है. धातु के सल्‍फर का अंश को कम करने के लिए डिसत्‍पराइजिंग कारक प्रयुक्‍त किया जाता है .

बेसिक ऑक्‍सीजन फरनेस

इस्‍पात बनाने के लिए बेसिक ऑक्‍सीजन प्रक्रिया मुख्‍यतः सामान्‍य प्रक्रिया है. बेसिक ऑक्‍सीजन फरनेस ( एल.डी.कनवर्टर ) अपवर्तक ब्रिक्‍स के साथ अन्‍दर की ओर नाशपाती के अकार का वेसल लाइन्‍ड फरनेस है. वेसल लाइनिंग टार बोन्‍डेड डोलोमाइट/मेगनेशिया कार्बन या अन्‍य अपवर्तकों का बना होता है. वेसल अपने अक्ष में 360 पर घुम सकता है. वाटर कूल्‍ड लान्‍स की सहायता से ऑक्‍सीजन वेसल में बह जाता है. थोड़ा झुका हुआ कनवर्टर में रद्दी माल के अधिक होने के साथ हीट बढ़ता है और कनवर्टर को सीधा (ठीक) करके गर्म धातु को मिलाया जाता है तत्‍पश्‍वात् लेंस के द्वारा घोल(बाथ) में आक्‍सीजन को दिया जाता है जिसमें आवश्‍यक फ्लक्‍सेज छोड़ा जाता है. कनवर्टर के उपर स्थित बंकर के द्वारा यंत्रवत और सूक्ष्‍म अतिरिक्‍त फ्लक्‍स मिलाया जाता है. 16-18 मिनट के लिए आक्‍सीजन छोड़ने के पश्‍चात एक नमूना लिया जाता है. थर्मोकपल का इस्‍तेमाल कर तापमान को मापा जाता है. टेपिंग साइड में कनवर्टर को टिलटिंग करके इस्‍पात को टेप्‍ड किया जाता है. जब धातु को टेप्‍ड किया जाता है तो ऐलाइंग तत्‍वों को शूट के द्वारा मिलाया जाता है. फ्लोटिंग स्‍लेग को हटाने के लिए चार्जिंग साइड की ओर कनवर्टर को टिल्‍टेड किया जाता है.

 

रिऐक्शन ---

प्रचालन के दौरान आक्‍सीजन से लोहा का आक्‍सीकरण करने पर लोहा ऑक्‍साइड और कार्बन मनोऑक्‍साइड हो जाता है. लोहा आक्‍साइड तत्‍काल अक्‍सीजन को ट्रैम्‍प तत्‍वों में अन्‍तरण कर देता है. लगभग 2000 डिग्री 2500 डिग्री सेंटिग्रेड तापमान पर रिएक्‍शन का केन्‍द्र होता है. परिष्‍कृत प्रक्रिया के दौरान कार्बन मनोअक्‍साइड के बढ़ने से पिघला उष्‍मक के अंदर ऐजिटेशन बढ़ता है. आक्‍सीजन से ट्रैम्‍प तत्‍वों का रिएक्‍शन और रिएक्‍शन के केन्‍द्र में लोहा आक्‍साइड बनता है जिससे रिएक्टिव स्‍लेग का निर्माण होता है. प्रचालन के जारी रहने पर गलन के समय कार्बन, फासफोरस, मैंगनीज और सिलिकन का निरन्‍तर कमी होता है. आक्‍सीजन के साथ पाउडर चूना को मिलाने पर शीघ्र ,स्‍लेग निर्माण होता है जिससे फासफोरस कम हो जाता है . जब वांछित कार्बन कानटेन्‍ट प्राप्‍त किया जाता है तो परिस्‍कृत प्रक्रिया पूर्ण हो जाता है. विविध अन्‍य ब्‍लोविग प्रक्रिया जिसका प्रयोग किया जाता है वह निम्‍न हैः

 

आक्‍सीजन बाटम ब्‍लोविंग प्रक्रियाः इस प्रक्रिया में कूल नाजल के नीचे से शुद्ध आक्‍सीजन को उष्‍मक (बाथ) में छोड़ा जाता है. अधिक गहन मिश्रण के कारण लोअर टैप से टेम टाइम में और ग्रेटर आउटपुट में प्रभाव पड़ता है.

 

कम्बाइनड ब्‍लोविंग प्रक्रियाः--

 

उपर से ऑक्‍सीजन का ब्‍लोविंग और नीचे से ऑक्‍सीजन का ब्‍लोविंग या इनर्ट गैस जैसे नाइट्रोजन या आर्गन के नीचे क्रियाशील होने पर कम्बाइनड ब्‍लोविंग प्रक्रिया होता है. उपर्युक्‍त प्रक्रियाओं से लाभ हैब्‍लोविंग साइकल का गतिवर्द्धन ( एक्‍सेलरेशन) 25 % तक , उच्‍च लाभ, लेस स्‍लेग, कनवर्टर लाइनिंग लाइफ में सुधार, विशिष्‍ट कमपोजिशन को प्राप्‍त करने में शुद्धता में वृद्धि धब्‍बा को कम करना. बेसिक ऑक्‍सीजन फरनेस में उत्‍पादित इस्‍पात निरंतर ढलाई (कास्टिंग)या इनगाट टीमिंग के लिए भेजा जाता है.

 

उत्‍पादन की अवस्‍थाऐं --

लगातार ढलाई के दौरान ,द्रव इस्‍पात (स्‍टील) पुरिंग लैडल से गुजरता है एवं टंडिश, जिसमें शार्ट,वाटर, कूल्‍ड कॉपर कोल्‍ड डिभाईस समायोजित किया जाता है, से होकर हवा बाहर निकलता है. सॉंचे का आकार इस्‍पात के आकार को निर्धारित करता है. सॉंचे के बॉटम को ढलाई से पहले डम्‍मी बार से मोहरबन्‍द (शिल्‍ड) कर दिया जाता है. जल्‍दी ही घोल (बाथ) इसके निर्दिष्‍ट इस्‍पात स्‍तर पर पहुंचायी जाती है. इसके दीवारों को रास्‍ट्राण्‍ड एडेहरिंग से बचाने के क्रम में सॉंचा सीधा घटता बढता हैं. रेड हॉट स्‍ट्राण्‍ड सत्‍तह क्षेत्र को ठोस बनाता है. डम्‍मी बार के सहायता से सर्वप्रथम सॉंचा से निकाला जाता है बाद में ड्राईविंग रोल्‍स द्वारा निकाला जाता है क्‍योंकि इसके तरल सारभाग एवं स्‍ट्राण्‍ड को सावधानीपूर्वक जल से छिड़काव कर ठंडा किया जाता है. जब तक पूर्ण रूप से ठोस नहीं हो जाता तब तक इसके रोल्‍स को सभी किनारों से स्‍पोर्ट दिया जाना चाहिए. यह बचाव स्‍टील थिन रिम जोन से बचाती है.

 

लगातार ढलाई

विश्‍व में कुल द्रव इस्‍पात का कुल 60% से अधिक के लिए लगातार ढलाई तकनीकी अकाऊण्‍टस. सी.सी.रूट के माध्‍यम से इस्‍पात प्रक्रिया का मुख्‍य फायदा हायर थिल्‍ड लोवर इनर्जी कंजम्‍पशन एलीमिनेशन ऑफ प्रायमरी मिल्‍स है.

 

जब एक बार यह ठोस बन जाती है तो स्‍ट्रैण्‍ड को मोबाइल कटिंग टार्चिज फेबरेबल टेकनालॅजिकल प्रॉपर्टीज द्वारा विभाजित किया जाता है. उच्‍च ढलाई गति आजकल प्राप्‍य हैडायमेन्‍शन पर निर्भर एवं स्‍ट्रैण्‍ड्स की संख्‍या का एक साथ ही ढलाई, 06 से 3.5 प्रति मिनट लगभग का गति संभव है स्‍लैब हेतु तर्रेट के सहायता से सिकुवेन्‍स कास्टिंग एवं कम्‍पोजिट कास्टिंग आजकल लगातार ढलाई का प्रायमरी फिचर्स है जिसमें दो लैडल लगता है तथा वीयर इक्‍सपोन्‍ड टंडिश हेतु सिवग्‍नेलिंग डिभाईसेस. एक दूसरे के बाद सीधे बीकास्‍ट हेतु स्‍टील का असमान ग्रेड बताता है. स्‍वच्‍छता में सुधार हेतु इनर्ट गैस की सहायता से टंडिश एवं सॉंचा उसी तरह लैडल और टंडिश के बीच पुरिंग स्‍टीम हेतु सुरक्षा के कुछ प्रकार.

 

सीधी लघुकरण प्रक्रियाः--

सीधी लघुकरण प्रक्रिया की सार्थकता एवं कृत्रिम ब्‍लास्‍ट फर्नेस हेतु वैकल्पिक फार्म. धातुक से रिमूभिंग ऑक्‍सीजन द्वारा ठोस स्‍पान्ज लोहा ( सीधी लघुकृत लोहा) तैयार किया जाता है. सीधी लघुकरण की तकनीक लघुकरण एजेंट एम्‍प्‍लाइड के टाईप के अनुसार भिन्‍न है एवं मेटालर्जिकल वेसेल जिसमें लघुकृत किया जाता है .

* गैस की कटौती

* ठोस लघुकृत एजेंट

गैस कटौती साधारणतः प्रयोग किया जाता है. रिडक्‍शन वेसेल इम्‍प्‍लाइड पर निर्भरहै--

 

* शाफ्ट फर्नेस

* रोटरी किन फर्नेस

* फ्यूडाईज्‍ड बेड एवं रिटोर्ट प्रक्रिया. गैसों का लघुकरण कार्बन मोनोक्‍साईड हाईड्रोजन है एवं उसके मिश्रण सामान्‍यतः प्राकृतिक गैसों में पाया जाता हैं. किसी भी आकार का कोयला सीधे प्रयोग में लाया गया ठोस लघुकरण एजेंट है, जिसके कारण बहुमूल्‍य कोक की आवश्‍यकता नहीं पड़ती है. निरन्‍तर शाफ्ट भट्ठी लघुकरण में प्रयोग किया जाता है.

 

गैस ज्‍यादातर सामान्‍य है. माइड्रेक्‍स, एच.वाई.एल. - प्रक्रिया इसी प्रकार के हैं. एच.वाई.एल. प्रक्रिया असंसवत ( डिसकंटीनिवस) रिटॉर्ट प्रकार का है. एस.एल/आर.एन एवं क्रूप-कोडिर रोटरी किल्‍न प्रकार के है. यह प्रक्रिया ठोस लघुकरण एजेंट में प्रयोग किया जाता है एवं निरंतर गति में परिचालित किया जाता है. सीधी कटौती हेतु अयस्‍क को ट्रैम्‍प एलेमेन्‍ट्स के निम्‍न कॉन्‍टेट एवं एफ.ई के उच्‍च प्रतिशत सहित ट्राईजेंट विनिर्देश प्राप्‍त करना पड़ता है. पेलेट्स का प्रयोग मुख्‍य रूप से इसी उद्देश्‍य हेतु किया जाता है. समस्‍त डी.आर.आई प्रक्रियाओं का आऊटपुट स्‍पान्‍ज आयरन है. स्‍पान्‍ज आयरन भी एच.बी.आई के लिए हॉट ब्रिकेटेड है. सफल स्‍टील बनाने की तकनीकी को ध्‍यान में रखकर डी.आर.आई को ई.ए.एफ के साथ सम्मिलित किया गया है.

 

प्रगलन कटौती टेकनालॉजीप्रगलन कटौती प्रायः कच्‍ची धातु से दो अवस्‍थाओं में गर्म धातु उत्‍पन्‍न करती है. अयस्‍कों को प्रथम चरण में घटाया गया और तब अंतिम कटौती एवं द्वितीय चरण में पिघलाया जाता है. प्रयोग में लाए जाने वाले कुछ बहुत ही सामान्‍य प्रक्रिया नीचे दिए गए है.

 

कोरेक्‍सः कोल रिडक्‍शन प्रोसेस ( कोरेक्‍स) वोयेस्‍ट अलपाईन इन्‍डस्‍ट्री एण्‍ड डी.भी.ए.आई द्वारा विकसित किया गया था यह दो चरणें में परिचालन किया जाता है जिसमें शॉफ्ट फर्नेस से डी.आर.आई. जैसा कि माईड्रेक्‍स में प्रयोग किया जाता है एवं एच.वाई.एल प्रक्रिया अंतिम स्‍मेल्‍टर गेसीफायर में आवेशित हो जाता है.

डी.आई.ओ.एस

डायरेक्‍ट आइरन स्‍मेल्टिंग रिडक्‍शन (डी.आई.ओ.एस) का विकास जापान लौह एवं इस्‍पात संघ ( जे.आई.एस.एफ) द्वारा किया गया. यह कोयला उपयोग का केन्‍द्र तथा आठ जापनी इस्‍पात निर्माताओं का संघ है. डी.आई.ओ.एस प्रणाली में तीन तरल बनाने की भट्टियॉं होती हैं. लौह आयस्‍क को प्रथम दो तरल बनाने के रिएक्‍टरों में पूर्व गर्म किया जाता है तथा दूसरे रिएक्‍टर में स्‍मेल्‍टर से स्‍वच्‍छ ऑफ गैस का उपयोग करते हुए 15-25 कम किया जाता है. स्‍मेल्‍टर से डस्‍ट हटाया जाता है. इसके अलाग कोल फाइन्‍स का लघु अंश, गर्म धातु उत्‍पादन के प्रति टन 50 किलो के क्रम में ऑफ गैस स्‍मेल्‍टर में डाला जाता है. प्राथमिक कोयले के कम्‍बुशन तथा पोस्‍ट कम्‍बुशन के लिए स्‍मेल्‍टर में आक्‍सीजन डाला जाता है. आक्‍सीजन लेन्‍स इस प्रकार बनाया गया होता है कि एक ही साथ कार्बन आक्‍सीडेशन के लिए हाई वेलोसिटी आक्‍सीजन तथा बाद के दहन के लिए लोअर वेलोसिटी आक्‍सीजन प्रदान किया जाय. पोस्‍ट कंबुशन का लक्ष्‍य 40 है एवं प्री रिडक्‍यान का 20 कोयले के प्रकार के उपर कोयले की खपत लगभग 700-800 किलो प्रति टन गर्म धातु निर्भर करता है.

 

असमेल्‍टः असमेल्‍ट प्रक्रिया का विकास असमेल्‍ट लिमिटेड अस्‍ट्रेलिया द्वारा किया गया. कनवर्टर में लम्‍प कोयले तथा फ्लक्‍स के साथ-साथ लम्‍प अयस्‍क अथवा अयस्‍क फाइन्‍स निरंतर डाला जाता है. उत्‍कृष्‍ट कोयला, आक्‍सीजन एवं वायु टॉंप लांस के माध्‍यम से डाला जाता है ताकि आप्‍लावित दहन हो सके. आक्‍सीकरण एवं न्‍यूनीकरण की अवस्‍था को वायु एवं कोयले के अनुपात को समायोजित करके तथा लांस में उत्‍कृष्‍ट कोयला डालने के अनुपात को नियंत्रित करके किया जाता है. सभी प्रतिक्रियाऍं एक ही रिएक्‍टर में पूरी की जाती हैं.

 

हिसमेल्‍टः हिसमेल्‍ट प्रक्रिया का विकास सी.आर.ए लिमिटेड, अस्‍ट्रेलिया एवं मिड्रेक्‍स कार्पोरेशन, अमेरिका द्वारा किया गया. मोल्‍टेन बाथ में कोयला बॉटम ट्यूअर्स के माध्‍यम से डाला जाता है. कार्बन तेजी से टूटता है एवं लौह अयस्‍क से आने वाले आक्‍सीजन से प्रतिक्रिया करके कार्वन मोनो आक्‍साइड एवं लौहा बनाता है. यह प्रतिक्रिया एन्‍डोथर्मिक है एवं इसलिए प्रक्रिया को जारी रखने के लिए अतिरिक्‍त ताप की आपूर्ति करनी पड़ती है. यह बाथ से निकलने वाले कार्बन मोनोआक्‍साइड एवं वायु के टॉप इंजेक्‍शन के प्रतिक्रिया से प्राप्‍त होता है. रिएक्‍टेड गर्म गैस पात्र से निकलता है एवं फ्लूडाइज्‍ड बेड में प्रयुक्‍त किया जाता है.

 

रोमेल्‍टः रोमेल्‍ट प्रक्रिया का विकास रूस में मास्‍को इस्‍पात एवं मिश्रधातु संस्‍थान द्वारा किया गया. इसकी मुख्‍य विशेषता यह है कि इस में कोई प्री रिडक्‍शन प्रक्रिया नहीं है. स्‍मेल्‍टर में वाटर में कूल्‍ड रूफ एवं दिवाले होती हैं जो स्‍लैग के संपर्क में होती हैं एवं धातु के संपर्क में पारंपरिक तापसह होती हैं. वायु एवं आक्‍सीजन के मिश्रण को ट्यूअर्स के दो कतारों से होकर डाला जाता है. कोयला एवं अयस्‍क गुरूत्‍व द्वारा डाला जाता है. यह प्रणाली आसान एवं सख्‍त है. रोमेल्‍ट में अन्‍य प्रक्रियाओं के वनस्‍पति अधिक ऊर्जा की खयत होती है क्‍योंकि इसमें प्री रिडक्‍शन एवं व्‍यापक कूलिंग नहीं होता है.

 

 

 

 

प्‍लाज्‍मास्‍मेल्‍टः प्‍लाज्‍मा आधारित स्‍मेल्टिंग प्रक्रिया में, प्रतिक्रिया कॉंक पिफल्‍ड शैफ्ट फरनेस में घटित होता है एवं जिसमें ट्यूर्स फरनेस के निचले भाग में संतुलित लगे होते हैं. शैफ्ट कॉक से पूरी तरह भरा होता है. प्‍लाज्‍मा उत्‍पादक एवं स्‍लैग निर्माण करने वाली सामग्री मिश्रित धातु आक्‍साइड ट्यूअर्स से संलग्‍न होते हैं. प्रत्‍येक ट्यूअर्स के सामने कॉक कॉलम के भीतर जहॉं रिडक्‍शन एवं स्‍मेल्टिंग होता है, एक कैविटि का निर्माण होता है. एक नियमित अन्‍तराल पर उत्‍पन्‍न स्‍लैग एवं धातु शैफ्ट फरनेस के तल से निकाला जाता है. लौह अयस्‍क के स्‍मेल्टिंग के मामले में फरनेस से ऑफ गैस, जिसमें मुख्‍यतया कार्बन मोनो आक्‍साइड एवं हाइड्रोजन होता है, का इस्‍तेमाल अयस्‍क के प्री रिडक्‍शन के लिए प्रयुक्‍त किया जा सकता है. प्रक्रिया के अन्‍य अनुप्रयोगों में, जैसे बैग हाउस डस्‍ट से मिश्र धातु प्राप्‍त करना, उत्‍पन्‍न गैस का प्रयोग इंधन गैस के रूप में किया जाता है. यदि कच्‍चे माल में उच्‍च बाष्‍प दबाब का धातु होता है. जैसे जिंक एवं लीड, तो ये धातुऍं ऑफ गैस के साथ निकलती हैं जो पिफर कन्‍डेंसर से होकर गुजरती है जहॉं धातुऍं गैस से अलग की जाती हें.

 

इस्‍पात बनाने के अन्‍य तरीकः

 

इलेक्ट्रिक आर्क फरनेसः इले‍क्ट्रिक आर्क फरनेस जैसा कि नाम से ही ज्ञात होता है कि यह ऐसा फरनेस है जिसमें ताप इलेक्ट्रिक आर्क की सहायता से पैदा किया जाता है जो ग्रेफाइट इलेक्‍ट्रोड्स से उत्‍पन्‍न होता है. इलेक्ट्रिक आर्क फरनेस के मुख्‍य अवयव है निकासी यंत्र के साथ फरनेस शेल एवं इलेथ्‍ट्रोडस तथा रिल्टिंग यंत्र के साथ रिमुवेबल रूफ .फरनेस शेल वृत्‍ताकार होता है एवं इसमें उष्‍म सह लाइन होते है. खोलने एवं निकासी करने के यंत्र निकासी के उद्देश्‍य हेतु एक दूसरे के विपरीत लगाए गए होते हैं. संपूर्ण फरनेस लगभग 42 डिग्री के कोण तक उठाया जा सकता है.सामान्‍यतया, रूफ हटाकर फरनेस को चार्ज किया जाता है. जब स्‍क्रैप डाला जाता है, एक चार्जिंग बकेट फरनेस के चारो ओर दौड़ता है. तल खुलता है एवं फरनेस का स्‍क्रैप कुछ ही मिनट में चार्ज हो जाता है. इस प्रक्रिया में एक नियंत्रण प्रणाली धीमे जलते इलेक्‍ट्रोड्स को तीब्र करता है. हाई वोल्‍टेज लो वोल्‍टेज एवं हाई एम्‍परेज में बदल जाता है. एक इलेक्ट्रिक आर्क फरनेस की कार्यक्षमता का सबसे महत्‍वपूर्ण मापदण्‍ड है 1 टन चार्ज के संदर्भ में ट्रांसफॉर्मर की शक्ति. माप 300 से 750 किलो-वोल्‍ट-एम्‍पीयर प्रति टन के आस-पास होती है. कुछ मामलों में 1000 कि-वो-ए/टन स्‍थापित किया गया है.

 

गलत प्रक्रिया

 

इलेक्ट्रिक आर्क फरनेस प्रक्रिया में सामान्‍यतया निम्‍नलिखित तरीकें शामिल हैं

चार्जिंग

मेल्टिंग

आक्‍सीडाइजिंग

डी आक्‍सीडाइजिंग अथवा रिफाइनिंग

 

स्‍क्रैप अथवा स्‍पांज लौहे के अलावा चार्ज में अयस्‍क, फ्कक्‍सेस ( लाइम,फ्लोर्सपर), रिडयुसिंग एजेंट ( कार्बन) एवं फोरोलाय के रूप में एलायिंग तत्‍व शामिल है. इन तत्‍वों को वर्क ओपेनिंग के माध्‍यम से आक्‍सीकरण के पहले अथवा उसके दौरान किया जा सकता है.

 

यह प्रक्रिया इलेक्ट्रिक आर्क के ज्‍पलन से शुरू होती है. अतिरिक्‍त आक्‍सीजन अथवा कुछ अन्‍य इंधन गैस का मिश्रण गलन प्रक्रिया के तीब्र कर सकता है. अधिकतम ट्रंसफरेबल इलेक्ट्रिक पावर एवं ताप सह लाइनों की उष्‍मा स्थिरता गलन के समय को निर्धरित करता है. अत्‍यधुनिक फरनेस, जिसमें विशेष क्षमता होती हैं (यू.एच.पी.फरनेस), गलाने का काम 40 से 60 मिनट तथा टैप टू टैप डेढ़ घंटे में कर देती है.

 

परिमार्जन के समय स्‍लैग का लौह आक्‍साइड बाथ के कार्बन के साथ प्रतिक्रिया करता है. इससे कार्बन मोनो आक्‍साइड निकलता है जो उबालने में सहायक होता है एवं उष्‍मा से फास्‍फोरस, हाइड्रोजन, नाइर्टोजन एवं अ-धातु योगिकों आदि अशुद्धयों को साफ करता है. सल्‍फर को पूर्णतया हटाया नहीं जा सकता है.

 

इलेक्ट्रिक आकै फरनेस में इस्‍पात बनाने के निम्‍नलिखित फायदे हैं--

 

         सम्‍भावित सभी प्रकार के इस्‍पात को गलाया जा सकता है.

         कम पूजी व्‍यय

         गलन प्रक्रिया को क्रमादेशित एवं स्‍वचालित किया जा सकता है.

         कार्यक्षमता अच्‍छी है.

          

लेकिन इसमें कुछ खामियॉं भी हैं. इसमें स्‍क्रैप का प्रयोग होता है तथा इ.ए.एफ रूट का प्रयोग केवल कम शुद्ध प्रकार के इस्‍पात बनाने में किया जा सकता है. ई.ए.एफ आधारित इस्‍पात निर्माण में कई नए प्रगति हुए हैं.डी.सी.आर्क तकनीक, स्‍क्रैप प्री हिटिगं, उत्‍तरार्द्ध दहन, आक्‍सीजन एवं इंजेक्‍शन के अविष्‍कार से उत्‍पादकता में बेतहासा वृद्ध हुई है एवं इलेक्ट्रिक के खपत में भी कमी आई है.